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बाराबंकी में घूमने की जगह Best places to visit in barabanki

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बाराबंकी में घूमने की जगह कौन कौन सी हैं Best places to visit in barabanki

बाराबंकी में घूमने की जगह Best places to visit in barabanki के बारे में बात करें तो कई ऐतिहासिक जगहें हैं जहाँ पांडवों ने भी वनवास के समय विचरण करते हुए महाभारत काल में कई चीजों की स्थापना की हैं | यदि हम बाराबंकी में घूमने की जगह की बात करे तो वो निम्नलिखित हैं | famous temple in barabanki

1 . सिद्धेश्वर महादेव

सिद्धेश्वर महादेव मंदिर अति प्राचीन मंदिर हैं , सिद्धेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास पांडव के वनवास काल से जुड़ा हुआ हैं इसका उल्लेख महाभारत महाकाव्य के पवित्र ग्रन्थ में वर्णित हैं | इसमें भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित हैं इसकी स्थापना पांडवों ने की थी | महाभारत काल में ये क्षेत्र घना जंगल हुआ करता था और इस जंगल में एक विशाल स्वच्छ पानी की झील विद्यमान थी , इस सिद्धेश्वर झील के प्रमाण अभी भी मिलते हैं | बाद में  हरिशरण दास जी ने इस विशाल मंदिर की खोज की ये काशी विश्वनाथ में तैनात डिप्टी कलेक्टर थे, यहां पर बाद में गौतम बौद्ध जी ने धर्मोंपदेश दिया | इस मंदिर के नाम से इस गांव का नाम सिद्धौर पड़ गया | यहां पहले भव्य मेले का आयोजन किया जाता था , यहाँ महा शिवरात्रि के दिन भी मेला आयोजित किया जाता हैं | महा शिवरात्रि के दिन इस मंदिर में शिव जी के दर्शन मात्र ही सारे कष्ट व पाप कट जाते हैं

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सिद्ध महादेव मनोकामना सिद्ध करने वाले – सिद्धेश्वर

सिद्धेश्वर महादेव मंदिर में पूरी श्रद्धा से जल अर्पित करने से सभी मनोकामनाएं सिद्ध होती हैं इसलिए इन्हें सिद्धेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता हैं | यहाँ पर प्रत्येक सोमवार को जल अर्पित करते समय बच्चे की प्राप्ति की मनोकामना भी पूर्ण होती है ||

2 . महादेवा

महादेवा एक प्राचीन प्रसिद्ध मंदिर हैं , जो की लोधेश्वर महादेव मंदिर से भी जाना जाता हैं |  इसमें स्थापित शिवलिंग पृथ्वी पर उपलब्ध 52 अनोखे एवं दुर्लभ शिवलिंगों में से एक है। यह बाराबंकी जिले में रामनगर तहसील के एक महादेवा नामक गांंव में  घाघरा नदी के तट पर स्थित है। ये लोधी राजपूतों के कुलदेवता भी कहलाते हैं, इस मंदिर की स्थापना महाभारत काल से पूर्व में हुई थी| मंदिर के पास एक कुआं है जिसे ‘पांडव-कुप’ कहते हैं | अज्ञातवास के समय यहाँ घना जंगल था यहीं पर पांडव ने कुछ समय के लिए अज्ञातवास लिया था |

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इस विशाल मंदिर की खोज एक विद्वान ब्राह्मण ने की जिनका नाम लोधेराम अवस्थी था | इन्ही के नाम से इस मंदिर का नाम पड़ा हैं , यह शिवलिंग इन्ही के खेत में खुदाई के दौरान मिला , तब लोधेराम जी ने वहां मंदिर निर्माण कर उसमे शिलिंग की स्थापित किया | यहां पर कांवड़  तीर्थयात्री हरिद्वार, गंगोत्री सहित गंगा के विभिन्न स्थानों से पवित्र जल एकत्र करके इसे महादेवा मंदिर तीर्थस्थल पर चढ़ाने के लिए लेकर आते हैं। 

3 .पारिजात वृक्ष

बाराबंकी का पारिजात वृक्ष – किन्तूर गांव में वर्षों तक पांडव छुपे रहे और इसी दौरान उन्होंने रामनगर के पास किंतूर क्षेत्र में पारिजात वृक्ष लगाया , इस वृक्ष की आयु 2000 -8000 वर्ष के बीच है।इसका पुष्प श्वेत रंग का होता है और सूखने पर सुनहले रंग का हो जाता है। पारिजात वृक्ष समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से एक, पारिजात वृक्ष जो बीज से नहीं उगता, इसकी कलम से दूसरा पेड़ नहीं बनता और इसमें फल नहीं लगते |

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इस वृक्ष में पुष्प बहुत ही कम संख्या में होते हैं , कभी-कभी ही गंगा दशहरा (जून के माह) के अवसर पर पेड़ों में लगते हैं। पारिजात वृक्ष सुख, प्रेम और मनोकामना पूर्ति का प्रतीक मन जाया है; इसके नीचे बैठकर प्रार्थना करने से कष्ट दूर होते हैं और इच्छाएं पूरी होती हैं।

विष्णु पुराण में उल्लेख है कि इस पारिजात वृक्ष को भगवान कृष्ण स्वर्ग से लाये थे और अर्जुन ने अपने बाण से पाताल में छिद्र कर इसे स्थापित किया था।

4. बाबा रामसनेही घाट

बाबा रामसनेही दास का मंदिर रामसनेही घाट पर स्थित है की बाराबंकी के तहसील रामसनेहीघाट मुख्यालय से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर कल्याणी नदी के तट पर स्थित है , बाबा राम सनेही दास मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है और यहां भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, मंदिर प्रांगण में शिव लिंग भी मौजूद है || यहाँ मंगलवार को दर्शन के लिए लोग पहुंचते हैं , अन्य दिनों में यहाँ सुकून से बैठ कर प्रभु में लीन हो सकते हैं मंदिर के पास में एक नदी है उसके सीढ़ियों पर शांति का आनंद ले सकते हैं , आस पास पैदल घूम सकते हैं एवं प्रकृति का आनंद ले सकते हैं |

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1610 में बाबा रामसनेही दास अमैनी से यहां पर आए थे और यहां पर घोर तप करने में लीन हो गए। 12 वर्ष तक तप करने के बाद हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिया और उन्हें अपना शिष्य बनाकर हनुमान जी अंतर ध्यान हो गए। इसके बाद बाबा रामसनेही दास ने यहां पर जिंदा समाधि ली। उन्होंने बताया कि यहां हर मंगलवार को सैकड़ों भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और कोई निराश नहीं लौटता।

स्थानीय एवं पुराने लोग बताते है कि 1658 में अंग्रेजों ने पूर्वांचल को जोड़ने के लिए कल्याणी नदी पर एक पुल बनाने का फैसला किया। पुल का प्रस्तावित मार्ग सीधे बाबा की समाधि से होकर गुजर रहा था। अंग्रेज अधिकारियों ने यह तय किया कि समाधि को हटाकर पुल का निर्माण किया जाएगा।

अंग्रेजों की देखरेख में कुशल कारीगरों ने पुल की जितनी भी पुल जोड़ा वह रात में अपने आप ढह जाती थी। कई हफ्तों तक यह सिलसिला चलता रहा और अंग्रेज अधिकारी हैरान और परेशान थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। लाख कोशिशों के बाद भी पुल का निर्माण आगे नहीं बढ़ पा रहा था। कहा जाता है कि एक रात बाबा ने पुल निर्माण के प्रभारी अंग्रेज अधिकारी के सपने में आकर कहा कि अगर तुम्हें पुल बनाना है, तो मेरी समाधि को छोड़ दो। मेरे स्थान से हटकर उत्तर दिशा में पुल का निर्माण करो तभी यह कार्य सफल होगा।

उस अंग्रेज अधिकारी को बाबा के चमत्कार के आगे झुकना पड़ा। उसने तुरंत निर्माण कार्य का स्थान बदला और समाधि स्थल को छोड़कर पुल का निर्माण करवाया। आश्चर्यजनक रूप से इस बार पुल का निर्माण बिना किसी रुकावट के पूरा हो गया। आज भी नदी में पुल के लिए पहली बार डाली गई कोठी देखी जा सकती है।

5. कोटवा धाम

बाबा जगजीवन दास की तपोस्थली और समाधि स्थल है, जहाँ उनकी मूर्ति की जगह समाधि की पूजा होती है; यह 350+ साल पुराना स्थान है, यहाँ शिव जी का प्राचीन शिवलिंग भी मौजूद हैं

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बाबा जगजीवन दास जन्म विक्रम संवत 1727 (ईस्वी सन 1670) में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के सरदहा ग्राम में हुआ था। बाबा जगजीवन दास चंद्रवंशी क्षत्रिय कुल से थे, लेकिन वे बचपन से ही सत्य और अध्यात्म की ओर झुकाव था,

बचपन में सरदहा ग्राम को छोड़कर बाराबंकी के निकट एक घने वन, जिसे आज कोटवा धाम के नाम से जाना जाता है में जाकर तपस्या की और यहीं बाबा जगजीवन दास जी को आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने समाज में व्याप्त आडंबरों, रिवाज, जाति-पाति के भेदभाव, छुआछूत और पाखंड का कड़ा विरोध किया।

6. औसानेश्वर महादेव

औसानेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण रोनी रियासत के राजा ने कराया, बाराबंकी जिले की हैदरगढ़ तहसील से छह किलोमीटर दूर गोमती के पावन तट औसानेश्वर का शिवलिंग स्थापित है, पुरातत्व विभाग के अनुसार, यह मंदिर लगभग 500 वर्ष पुराना है और पांडवकालीन शिवलिंग है , जिस पर आज भी घाव का निशान मौजूद है यह मंदिर ढाई एकड़ क्षेत्र में फैला है , यहाँ गोमती के घाट भी देखने को मिलेंगे, इसे आप अध्यात्म और सुकून की जगह के लिस्ट में रख सकते हैं , अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र के वनों में निवास किया था और विजय प्राप्ति के लिए यहाँ शिवलिंग की पूजा की थी |

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औसानेश्वर महादेव के मुख्य शिवलिंग के अलावा, मंदिर परिसर में मां दुर्गा, हनुमान जी और भगवान राम के भी विग्रह स्थापित हैं, जो इसे एक पूर्ण धार्मिक केंद्र बनाते हैं। शिव पुराण और स्कंद पुराण में गोमती नदी के तट पर स्थित उन दिव्य शिवलिंगों का वर्णन है जिनकी स्थापना प्राचीन ऋषियों द्वारा की गई थी। अवसानेश्वर को उन्हीं प्राचीन सिद्ध स्थलों में गिना जाता है।

मुगल शासक औरंगजेब ने इस शिवलिंग को नष्ट करने का प्रयास किया था सांप, बिच्छू , भर्रैया और अन्य जीव-जंतु निकलकर सैनिकों पर हमला करने लगे जिसके वजह से सैनिकों में भगदड़ मच गई और औरंगजेब को वापस लौटना पड़ा ||

7. माँ विद्यावती नव दुर्गा मन्दिर

बाराबंकी का मां विद्यावती नवदुर्गा मंदिर एक नवनिर्मित और भव्य मंदिर है, जो बाराबंकी-बहराइच हाईवे पर स्थित है, जहाँ माँ दुर्गा के नौ रूपों की प्रतिमाएं स्थापित हैं ये प्रतिमाएं आध्यात्मिक शांति और देवी दर्शन का अनुभव कराती हैं। इसमें हनुमान जी , राम सीता और लक्ष्मण जी, शंकर पार्वती जी , गणेश जी और राधा कृष्ण जी के सुन्दर प्रतिमाएं स्थापित हैं |

मंदिर की संरचना पारंपरिक हिंदू तत्वों और आधुनिकता का बेहतरीन मिश्रण है। इसके जीवंत भित्ति चित्र, जटिल नक्काशी और देवी दुर्गा की सुंदर रूप से सजी प्रतिमा आँखों को और मन को आध्यात्मिक आनंद प्रदान कराती हैं।

इस मंदिर में शांत वातावरण है और सुव्यवस्थित परिसर होने का वजह से ध्यान, प्रार्थना और आत्मचिंतन के लिए एक आदर्श स्थान माना जा सकता है |

अन्य स्थानों का भी जल्द ही अपडेट किया जाएगा…

अगर आपके आस पास कोई अच्छी घूमने की बढ़िया जगह/ मंदिर या स्थान है तो कमेंट में हमें उस स्थान का नाम बताएं हम इसे आगे अपने लेख में अपडेट करेंगे। …

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